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मुफ्तखोरी और नकद हस्तांतरण योजनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने कई राज्यों की सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि पहले से राजस्व घाटे में चल रहे राज्य मुफ्त बिजली और नकद योजनाओं का खर्च कैसे उठाएंगे। कोर्ट ने ऐसी योजनाओं को देश की आर्थिक स्थिरता और कार्य संस्कृति के लिए चुनौतीपूर्ण बताया, जिससे राजनीतिक दलों के बीच भी हलचल तेज हो गई है।
मध्य प्रदेश में लाड़ली बहना योजना पर वित्तीय वर्ष 2026-27 में 23 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया है, जो राज्य के कुल बजट का लगभग 7 प्रतिशत है। इसके अलावा किसानों को सब्सिडी, करीब दो करोड़ लोगों को मुफ्त राशन और बिजली पर रियायत जैसी योजनाओं पर भी भारी खर्च हो रहा है। कर्नाटक में ऐसी योजनाओं पर लगभग 28 हजार करोड़ और महाराष्ट्र में करीब 46 हजार करोड़ रुपये व्यय किए जा रहे हैं, जिससे राज्यों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
लाड़ली बहना के अलावा साइकिल, स्कूटी, लैपटॉप, साड़ी, जूते, कन्यादान और रसोई गैस सब्सिडी जैसी योजनाएं भी सरकारी खजाने पर असर डाल रही हैं। अनुमान है कि राज्य में इस तरह की योजनाओं पर सालाना करीब 52 हजार करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं, जबकि कुल बजट 4.38 लाख करोड़ रुपये है। चुनावी दौर में शुरू हुई इन योजनाओं का दायरा लगातार बढ़ रहा है, जिससे दीर्घकालिक वित्तीय प्रबंधन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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