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भोपाल। मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने जीवनरक्षक एवं आवश्यक दवाओं की मनमानी कीमतों और मरीजों पर पड़ रहे आर्थिक बोझ को लेकर महामहिम राष्ट्रपति को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।जीतू पटवारी ने अपने पत्र में कहा कि देश के करोड़ों नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा यह अत्यंत गंभीर विषय हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सामने आया है। 22 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने आवश्यक कैंसर दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि न्यायालय के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि एक कैंसर दवा का Price to Retailer ₹2,700 था, जबकि उसका Maximum Retail Price ₹27,000 अंकित था। अर्थात मरीज से वसूली जाने वाली अधिकतम कीमत उस कीमत की लगभग दस गुनी थी, जिस कीमत पर दवा रिटेलर को उपलब्ध कराई जा रही थी। पटवारी ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस स्थिति को गंभीर मानते हुए मरीजों के साथ हो रही इस प्रकार की कीमत-वसूली पर कड़ी टिप्पणी की और यह प्रश्न उठाया कि संबंधित प्राधिकरण ऐसी स्थिति पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल किसी एक दवा की कीमत का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की समीक्षा का विषय है जिसके अंतर्गत जीवन बचाने के लिए आवश्यक दवाओं की कीमत और उनके वास्तविक व्यापारिक मूल्य के बीच असाधारण अंतर संभव हो रहा है। पटवारी ने अपने पत्र में कहा कि देश में Drugs (Prices Control) Order, 2013 (DPCO) पहले से अस्तित्व में है। इसके अंतर्गत Scheduled medicines के लिए Ceiling Price निर्धारित करने की व्यवस्था है तथा Para 19 सरकार को असाधारण परिस्थितियों और सार्वजनिक हित में किसी दवा का Ceiling Price अथवा Retail Price निर्धारित करने की शक्ति देता है। उन्होंने कहा कि सरकार इस शक्ति का पूर्व में उपयोग भी कर चुकी है। National Pharmaceutical Pricing Authority के अनुसार फरवरी 2019 में 42 Anti-Cancer Non-Scheduled medicines के संबंध में Trade Margin Rationalisation लागू किया गया था। इससे स्पष्ट है कि जीवनरक्षक दवाओं को मरीजों की पहुंच में रखने के लिए सरकार के पास नियामकीय हस्तक्षेप का रास्ता उपलब्ध है।
पटवारी ने सवाल उठाया कि यदि आज सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष ऐसी स्थिति आती है, जिसमें ₹2,700 की दवा का MRP ₹27,000 बताया जाता है, तो मौजूदा मूल्य-नियंत्रण व्यवस्था पर्याप्त क्यों नहीं है और सार्वजनिक हित में उपलब्ध शक्तियों का व्यापक उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में यह भी तर्क रखा गया है कि बड़ी संख्या में दवाएं Non-Scheduled श्रेणी में आती हैं और उनके प्रारंभिक मूल्य निर्धारण को लेकर मजबूत स्पष्ट व्यवस्था मौजूद नहीं है। यदि यह व्यवस्था जीवनरक्षक दवाओं में अत्यधिक मूल्य-अंतर की गुंजाइश छोड़ती है, तो इसकी तत्काल समीक्षा आवश्यक है। जीतू पटवारी ने कहा कि कैंसर का उपचार सामान्य उपभोक्ता बाजार की वस्तु नहीं है। कैंसर से पीड़ित व्यक्ति के सामने दवा खरीदना किसी विकल्प का प्रश्न नहीं, बल्कि जीवन बचाने की मजबूरी होती है। ऐसी परिस्थिति में MRP और वास्तविक आपूर्ति मूल्य के बीच असामान्य अंतर का बोझ सीधे मरीज और उसके परिवार पर पड़ता है।
उन्होंने कहा कि यदि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के अंतर्गत दवा की खरीद अथवा Reimbursement की जाती है, तो इसका अतिरिक्त भार सार्वजनिक धन और करदाताओं पर भी पड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई में इस पहलू पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई है।
मांगें
1. सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उठे इस गंभीर मुद्दे के संबंध में केंद्र सरकार से तत्काल विस्तृत तथ्यात्मक रिपोर्ट मंगाई जाए।
2. अनुच्छेद 78 के अंतर्गत उपलब्ध संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए केंद्र सरकार से स्पष्ट कराया जाए कि जीवनरक्षक एवं आवश्यक दवाओं की कीमतों में असाधारण अंतर को रोकने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई है।
3. कैंसर सहित गंभीर एवं जीवनरक्षक रोगों में प्रयुक्त सभी आवश्यक दवाओं की मौजूदा मूल्य-नियंत्रण व्यवस्था की व्यापक समीक्षा कराई जाए।
4. जहां आवश्यक हो, DPCO, 2013 के अंतर्गत उपलब्ध सार्वजनिक हित की शक्तियों का तत्काल उपयोग करते हुए ऐसी दवाओं के लिए प्रभावी Ceiling Price अथवा Retail Price निर्धारित करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
5. Price to Retailer, Price to Stockist और Maximum Retail Price के बीच असामान्य अंतर वाली दवाओं की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान कर उनकी विशेष ऑडिट/जांच कराई जाए।
6. कैंसर सहित गंभीर रोगों की दवाओं के लिए ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें मरीज और उसके परिवार को दवा की वास्तविक नियंत्रित कीमत, व्यापारिक मार्जिन और अधिकतम खुदरा कीमत की स्पष्ट जानकारी मिल सके।
7. सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में ऐसी दवाओं की खरीद और Reimbursement व्यवस्था का स्वतंत्र परीक्षण कराया जाए, ताकि सार्वजनिक धन से अनावश्यक रूप से अत्यधिक कीमत का भुगतान न हो।
8. आवश्यक एवं जीवनरक्षक दवाओं को व्यापक मूल्य-नियंत्रण के दायरे में लाने के लिए केंद्र सरकार को समयबद्ध नीति तैयार करने के लिए निर्देशित किया जाए।
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