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जन्माष्टमी के मौके पर आधुनिक दौर में भी भगवान श्रीकृष्ण और राधा की परंपरा बच्चों के जरिए जीवंत होती नजर आ रही है। शहर में कई बच्चे कान्हा और राधा की पारंपरिक वेशभूषा में सजकर जन्माष्टमी के उत्सव में रंग भर रहे हैं। कहीं नन्हे कान्हा सिर पर मोरपंख, हाथ में बांसुरी और पीतांबर पहने नजर आ रहे हैं, तो कहीं बच्चियां राधा के रूप में लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं। सात वर्षीय रोशनी डी. चौधरी ने भी पारंपरिक वेशभूषा में राधा का रूप धारण कर जन्माष्टमी की भक्ति और उल्लास की खूबसूरत झलक पेश की। मूल रूप से राजस्थान के जालोर जिले की रहने वाली रोशनी फिलहाल हुब्बल्ली में रहती हैं।
जन्माष्टमी सिर्फ भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ने का भी अवसर है। इस दिन घरों और मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है और बच्चे कृष्ण-राधा के रूप में तैयार होकर उत्सव का हिस्सा बनते हैं। डिजिटल दौर में बच्चों का काफी समय मोबाइल और इंटरनेट पर बीतता है, ऐसे में त्योहारों से जुड़ी गतिविधियां उन्हें अपनी संस्कृति और परंपराओं से करीब लाने का काम करती हैं। माता-पिता भी बच्चों को कृष्ण और राधा की तरह सजाकर इस पर्व की खुशियां साझा करते हैं और उन्हें भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, उनके जीवन और भारतीय परंपराओं के बारे में बताते हैं।
नन्हे कान्हा के सिर पर सजा मोरपंख, हाथों में बांसुरी और चेहरे पर मासूम मुस्कान जन्माष्टमी के माहौल को और खास बना देती है। वहीं राधा के रूप में सजी बच्चियों की पारंपरिक पोशाक और श्रृंगार उत्सव की रौनक बढ़ाते हैं। बच्चों के इन रूपों में केवल त्योहार की खुशी ही नहीं, बल्कि परिवार और समाज के बीच संस्कृति को आगे बढ़ाने की तस्वीर भी दिखाई देती है। जन्माष्टमी के दौरान होने वाली झांकियां, भजन, पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम बन रहे हैं। इस तरह बदलते समय के बीच भी कृष्ण-राधा की परंपरा नई पीढ़ी के जरिए लगातार आगे बढ़ती नजर आ रही है।
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