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लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 360 वोटों की जरूरत है, लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली NDA सरकार के पास फिलहाल सिर्फ 293 सांसद हैं। यानी सरकार को 67 अतिरिक्त वोटों की दरकार है। गुरुवार को हुई वोटिंग में 251 सांसद बिल के समर्थन में और 185 विरोध में रहे, जिससे साफ हो गया कि मौजूदा हालात में सरकार जरूरी आंकड़े से काफी पीछे है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, टीएमसी और डीएमके समेत विपक्ष के लगभग 234 सांसद बिल के खिलाफ खड़े हैं।
राजनीतिक दबाव के बीच सरकार ने 2023 के महिला आरक्षण कानून को 16 अप्रैल 2026 से लागू मानते हुए गजट नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। इसे विपक्ष ने सरकार की रणनीतिक चाल बताया है, ताकि नए बिल के फेल होने की स्थिति में पुराना कानून बचाया जा सके। पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी आचार्य के मुताबिक सरकार के पास तीन विकल्प हैं—सीधी वोटिंग कराना, बिल को सेलेक्ट कमेटी में भेजना या विपक्ष से सहमति बनाना। यह भी संकेत हैं कि सरकार हार के जोखिम से बचने के लिए कमेटी का रास्ता चुन सकती है।
बिल को लेकर सहयोगी दलों और क्षेत्रीय पार्टियों की शर्तें भी सरकार के लिए चुनौती बन रही हैं। आंध्र प्रदेश की YSRCP ने परिसीमन को लेकर लिखित आश्वासन मांगा है, जबकि दक्षिण भारत के कुछ भाजपा सांसद भी समय और रणनीति पर सवाल उठा रहे हैं। इस बीच नरेंद्र मोदी ने सांसदों को चेताया कि महिलाएं उनकी नीयत भी देखेंगी, जिस पर विपक्ष ने पलटवार करते हुए सरकार पर जल्दबाजी और राज्यों की चिंताओं की अनदेखी का आरोप लगाया। अब नजर इस बात पर है कि सरकार संख्या जुटाने में सफल होती है या रणनीति बदलती है।
Patrakar sneha singh
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