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समाजवादी पार्टी (सपा) के लिए आजम खान पिछले तीन दशकों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे मजबूत चेहरों में से एक रहे हैं। रामपुर सदर सीट से 10 बार विधायक रह चुके आजम खान ने मुस्लिम वोट बैंक को सपा के साथ जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। यादव-मुस्लिम गठजोड़ को मजबूत करने का श्रेय भी काफी हद तक उन्हें ही दिया जाता है। 2022 के विधानसभा चुनाव में जेल में रहते हुए भी उनकी जीत ने उनके प्रभाव को साबित किया था। लेकिन अब उनकी गैरमौजूदगी सपा के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बनती जा रही है।
पैन कार्ड फर्जीवाड़ा मामले में सजा और संभावित अयोग्यता के चलते 2027 विधानसभा चुनाव में आजम खान की भूमिका लगभग खत्म होती दिख रही है। ऐसे में Akhilesh Yadav के नेतृत्व में सपा को नया नेतृत्व तैयार करना पड़ रहा है। रामपुर समेत पश्चिमी यूपी में पार्टी अब “पोस्ट-आजम” रणनीति पर काम कर रही है, लेकिन समर्थकों में असंतोष भी देखने को मिल रहा है। पार्टी द्वारा नए चेहरों को आगे लाने की कोशिशें जारी हैं, परंतु आजम खान जैसा जनाधार और पकड़ बनाना आसान नहीं माना जा रहा।
आजम खान की गैरमौजूदगी का सबसे बड़ा असर मुस्लिम वोट बैंक पर पड़ सकता है, जो अब बिखरने की स्थिति में नजर आ रहा है। Asaduddin Owaisi की AIMIM, Chandrashekhar Azad की पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे विकल्प इस खाली जगह को भरने की कोशिश कर सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर सपा इस वोट बैंक को संभालने में असफल रही, तो 2027 के चुनाव में उसे पश्चिमी यूपी की 10-15 सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे में सपा के लिए यह चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने पारंपरिक आधार को बचाने की चुनौती भी बन गया है।
Patrakar sneha singh
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