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सुप्रीम कोर्ट ने जाति जनगणना कराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है। सोमवार (2 सितंबर) को जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि जाति जनगणना एक नीतिगत विषय है, जो पूरी तरह केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे मामलों में अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती। याचिकाकर्ता पी. प्रसाद नायडू ने केंद्र सरकार को जाति जनगणना कराने के निर्देश देने की मांग की थी।
याचिका में कहा गया था कि अब तक जनगणना-2021 की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। पहले कोविड-19 महामारी और बाद में बार-बार स्थगन के कारण जनगणना टलती रही, जिससे आंकड़ों में बड़ा अंतर पैदा हो गया है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील रविशंकर जंडियाला ने दलील दी कि कई देशों में जाति आधारित जनगणना की जा चुकी है और 1992 के इंद्रा साहनी फैसले में भी समय-समय पर ऐसे आंकड़े जुटाने की जरूरत बताई गई है।
इस मुद्दे पर सियासत भी तेज है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 24 अगस्त को जाति जनगणना का समर्थन करते हुए कहा था कि देश के प्रमुख संस्थानों, उद्योग, कॉर्पोरेट, मीडिया और बैंकिंग सेक्टर में दलितों-आदिवासियों की भागीदारी बेहद कम है। वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने 2 सितंबर को कहा कि जाति आधारित जनगणना समाज के कल्याण के लिए जरूरी हो सकती है, लेकिन इसका इस्तेमाल चुनावी राजनीति के लिए नहीं होना चाहिए। संघ ने साफ किया कि जनगणना का उद्देश्य केवल सटीक डेटा जुटाना और समाज की भलाई होना चाहिए, न कि इसे राजनीतिक हथियार बनाना।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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