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जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) के ‘आइडियाज ऑफ जस्टिस’ सत्र में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने न्याय व्यवस्था, जवाबदेही और सामाजिक बदलाव पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि जज भी समाज से आते हैं, जहाँ भ्रष्टाचार मौजूद है, लेकिन उनसे उच्चतम मानदंडों की अपेक्षा होती है। चंद्रचूड़ ने स्पष्ट किया कि करप्शन को जस्टिफाई नहीं किया जा सकता, लेकिन हर गलत फैसले को भ्रष्टाचार कहना भी आसान नहीं। उनके अनुसार, इसके लिए जवाबदेही तय करने वाला एफिशिएंट सिस्टम जरूरी है।
पूर्व CJI ने ऐतिहासिक फैसलों का उदाहरण देते हुए बताया कि कुछ निर्णय फ्लोरिश के साथ आते हैं, जैसे समलैंगिकता को अपराधमुक्त करने वाला फैसला। उमर खालिद केस पर बोलते हुए उन्होंने बेल के सिद्धांत समझाया और कहा कि कानून इनोसेंस की पूर्वधारणा पर आधारित है। बेल न देने के केवल तीन अपवाद हैं: आरोपी दोबारा गंभीर अपराध कर सकता है, ट्रायल से भाग सकता है, या सबूतों में छेड़छाड़ कर सकता है।
चंद्रचूड़ ने नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े मामलों में बेल की प्रथा और प्री-ट्रायल डिटेंशन पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ट्रायल समय पर न होने पर आर्टिकल 21 के तहत स्पीडी ट्रायल का अधिकार प्रभावित होता है। जिला और हाईकोर्ट में बेल न देने की प्रवृत्ति से सुप्रीम कोर्ट पर केसों का बोझ बढ़ता है, जिससे सालाना लगभग 70 हजार मामले वहां पहुंचते हैं। उनका संदेश स्पष्ट था: संविधान सर्वोपरि है, और न्याय तंत्र को समाज और बदलते समय के अनुरूप प्रभावी और जवाबदेह होना चाहिए।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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