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कलियासोत,केरवा सेंचुरी में शामिल नहीं
भोपाल में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने राज्य सरकार को नोटिस भेजकर पूछा है कि रातापानी वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी के चारों ओर 10 किलोमीटर के दायरे में चल रहीं 93 खदानों और क्रैशर्स क्यों न बंद कर दिए जाएं। एनजीटी ने 24 घंटे के भीतर शासन से इस मामले में अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है।
साथ ही सरकार ने ngt में कहा है कि केरवा और कलियासोत डेम के क्षेत्र को सेंक्चुरी में शामिल नहीं किया जा सकता। सरकार के पास ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है।
एनजीटी ने अपने आदेश में कहा है कि रातापानी सेंक्चुरी एक 'ईको सेंसेटिव जोन' है। केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु मंत्रालय (एमओईएफ) की ओर से वर्ष 2011 में बनाई गई गाइडलाइन में स्पष्ट किया गया है कि नेशनल पार्क और वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी के ईको सेंसेटिव जोन से 10 किमी की दूरी तक खनन, निर्माण और औद्योगिक ईकाइयों की स्थापना नहीं की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट भी इस संबंध में आदेश जारी कर चुका है। इस पर राज्य शासन की ओर से अधिवक्ता सचिन वर्मा और पीसीबी की ओर से अधिवक्ता पारुल भदौरिया ने सेंक्चुरी में खनन के संबंध में जवाब पेश किया था।
गौरतलब है कि रातापानी सेंक्चुरी के चारों ओर 10 किलोमीटर की परिधि में 93 खदानें और क्रैशर्स संचालित हैं। इनमें से 34 खदानें ऐसी हैं, जो सेंक्चुरी से 1.5 किलोमीटर की परिधि में मौजूद हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक इन खदानों और क्रैशर्स से सेंक्चुरी की ईकोलॉजी पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। धूल के गुबार और खनन के कारण हरित क्षेत्र कम हो रहा है। वहीं सेंक्चुरी में भारी वाहनों के अनियंत्रित प्रवेश से होने वाला शोरगुल वन्यजीवों को नुकसान पहुंचा रहा है।
संतोष भारती की ओर से दायर इस याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस दलीप सिंह ने कहा कि रातापानी को सरकार न तो टाइगर रिजर्व बनाना चाहती है, न ही वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी के लिए जरूरी मानकों को पूरा कर रही है। ट्रिब्यूनल ने सरकारी वकील से पूछा कि रातापानी को लेकर आखिर सरकार का स्टैंड क्या है?
पिछली सुनवाई पर इंटरविनर अजय दुबे ने रातापानी सेंक्चुरी का एरिया बढ़ाने की मांग की थी। इस पर शासन ने एनजीटी में जवाब पेश किया है कि केरवा और कलियासोत डेम के क्षेत्र को सेंक्चुरी में शामिल नहीं किया जा सकता। सरकार के पास ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है। इसके साथ ही आसपास गांव में मौजूद 360 हैक्टेयर के छोटे झाड़ के जंगल को भी सेंक्चुरी में शामिल नहीं किया जा रहा है।
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