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सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार की गई फर्जी कानूनी जानकारी और नकली फैसलों का इस्तेमाल बेहद गंभीर बताते हुए कड़ी चेतावनी दी है। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि ऐसे मनगढ़ंत उदाहरण न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाते हैं। कोर्ट ने इसकी गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह खतरा भोपाल गैस त्रासदी में मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव जितना विनाशकारी हो सकता है। इसी टिप्पणी के साथ अदालत ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) का एक फैसला रद्द कर दिया।
यह मामला एस्सेल इन्फ्राप्रोजेक्ट लिमिटेड, जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड और पूजा रमेश सिंह से जुड़े दिवालियापन विवाद का था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि NCLT ने अपने फैसले के समर्थन में जिन कानूनी मामलों का हवाला दिया था, उनमें कई फैसले वास्तविक थे ही नहीं और उनकी साइटेशन भी पूरी तरह मनगढ़ंत थीं। जम्मू-कश्मीर बैंक ने शपथपत्र में स्पष्ट किया कि उसके वकीलों ने इन फर्जी मामलों का उल्लेख नहीं किया था, बल्कि इन्हें ट्रिब्यूनल की ओर से किए गए शोध के दौरान शामिल किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह AI तकनीक के खिलाफ नहीं है, लेकिन AI से प्राप्त जानकारी को बिना सत्यापन के अदालत में पेश करना गंभीर पेशेवर लापरवाही है। अदालत ने कहा कि अंतिम जांच और निर्णय की जिम्मेदारी हमेशा इंसानों की होनी चाहिए। साथ ही बार काउंसिल ऑफ इंडिया से AI के उपयोग को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार करने और अदालतों में फर्जी AI-जनित सामग्री पेश करने वालों के खिलाफ जवाबदेही तय करने की व्यवस्था बनाने की सिफारिश की है।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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