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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में साफ किया है कि आपराधिक मामलों में फाइनल बहस के बाद फैसला सुरक्षित रखने वाला जज ही निर्णय सुनाएगा। चाहे उस जज का तबादला किसी दूसरी अदालत या जिले में क्यों न हो जाए, उत्तराधिकारी जज उस मामले में दोबारा फाइनल बहस कराने का आदेश नहीं दे सकता। जस्टिस स्वर्णकांत शर्मा की बेंच ने कहा कि एक बार जब ट्रायल पूरा हो जाए और बहस सुन ली जाए, तो उसी जज को फैसला सुनाना चाहिए, ताकि न्याय में अनावश्यक देरी न हो।
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल के आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि ट्रांसफर के समय न्यायिक अधिकारियों को उन सभी मामलों की जानकारी देनी होगी, जिनमें उन्होंने फाइनल बहस सुनकर फैसला सुरक्षित रखा है। ऐसे मामलों में ट्रांसफर के बाद भी वही जज फैसला सुनाएगा। कोर्ट ने कहा कि नए जज द्वारा दोबारा बहस कराने से त्वरित न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन होता है और इससे मामलों में बेवजह देरी होती है।
यह आदेश मकोका (MCOCA) के तहत दर्ज एक मामले में दिया गया। आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील कर कहा था कि फाइनल बहस पूरी होने और फैसला सुरक्षित रखने के बाद जज का ट्रांसफर हो गया, जिसके बाद नए जज ने दोबारा बहस का आदेश दे दिया। हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि पुराने जज को ही फैसला सुनाने का अधिकार है। कोर्ट ने मानवीय पहलू पर भी जोर देते हुए कहा कि जेल में बंद आरोपी के लिए फैसला सुरक्षित रहने की अवधि बेहद तनावपूर्ण होती है और दोबारा बहस कराना उसके लिए मानसिक रूप से कठिन हो सकता है। इसलिए अदालतों को कानून के साथ-साथ इंसानियत का भी ध्यान रखना चाहिए।
Patrakar Priyanshi Chaturvedi
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