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शाजापुर। कार्तिक दशमी पर होने वाले कंस वधोत्सव की तैयारी हो चुकी है। अत्याचार के प्रतीक कंस का 10 फीट ऊंचा पुतला भी सिंहासन पर बैठाया गया है। कंस चौराहा स्थित दरबार में कंस का वध किया जाएगा। गवली समाज के युवाओं द्वारा पुतले को लाठियों से पीटते हुए यहां लाया जाया जाएगा। 270 वर्षों से यह परंपरा निभाई जा रही है। इस आयोजन में कंस और कृष्ण की सेना आपस में वाक् युद्ध करती हैं, इसके बाद श्रीकृष्ण द्वारा कंस का वध किया जाता है।
कंस वध की परंपरा अन्याय व अत्याचार पर जीत की प्रतीक
कंस वधोत्सव समिति के संयोजक तुलसीराम भावसार ने बताया कि मथुरा के बाद नगर में इस आयोजन को भव्य तरीके से मनाया जाता है। यहां इस आयोजन में शहर ही नहीं बल्कि शाजापुर जिले सहित आसपास के जिलों के लोग भी शामिल होते हैं। कंस वध की परंपरा अन्याय व अत्याचार पर जीत के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है। गोवर्धन नाथ मंदिर के मुखिया स्व. मोतीराम मेहता ने करीब 270 वर्ष पूर्व मथुरा में कंस वधोत्सव कार्यक्रम होते देखा और फिर शाजापुर में वैष्णवजन को अनूठे आयोजन के बारे में बताया। इसके बाद से ही परंपरा की शुरुआत हो गई। मंदिर में ही 100 वर्ष तक आयोजन होता रहा किंतु फिर इसे नगर के चौराहे पर किया जाने लगा।
श्रीकृष्ण वेशधारी करेगा कंस का वध
कंस वध के पूर्व बालवीर हनुमान मंदिर परिसर से चल समारोह शुरू होगा। रात साढ़े 8 बजे शुरू हुआ समारोह शहर के मुख्य मार्गों से होता हुआ कंस चौराहे पर पहुंचेगा। यहां पहले वाक युद्ध होगा और रात 12 बजे श्रीकृष्ण बने कलाकारों द्वारा कंस का वध किया जाएगा। कंस वध से पहले पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे देव और दानवों की टोलियां निकलती है। राक्षस हुंकार भरते है तो देवों की टोली उन्हें जवाब देती है।
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