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चलते चलते, मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा न कहना, रोते हसते, बस यूं ही तुम गुनगुनाते रहना, कभी अलविदा न कहना' किशोर का यह गीत हर किसी की जुबान पर है, लेकिन शुक्रवार दोपहर जब संविधान निर्माता भारत रत्नी डॉ. भीमराम अम्बेड़कर की जयंती के मौके पर सेन्ट्रल जेल ग्वालियर से 22 बंदियों को रिहा किया गया।भिंड से हत्या के मामले में बंद झब्बू उर्फ मूरत भदौरिया ने खुले आसमान में आने से पहले जेल में अपने साथियों के बीच यह मशहूर गाना गया। ज्यादातर बंदी हत्या के मामले के ही रिहा हुए हैं। जेल की चारइस मौके पर केन्द्रीय जेल के जेल अधीक्षक विदित सरवइया ने कहा कि क्रोध पर काबू किया होता तो जीवन के वह कीमती साल जो आपके परिवार की जरूरत के थे बच सकते थे और जेल में आपका जीवन बर्बाद नहीं होता। इसके बाद जेल अधीक्षक ने अम्बेड़कर जयंती के मौके पर बंदियों को रिहाई देते समय उनका शॉल श्रीफल से सम्मान भी किया। यह पहला मौका है जब अंबेडकर जयंती पर बंदियों की रिहाई हुई, इससे पहले 26 जनवरी और 15 अगस्त पर ही बंदियों की रिहाई की जाती थी। पर अब अम्बेड़कर जयंती व गांधी जयंती को भी इसमें शामिल किया गया है। इस अवसर पर जेल प्रबंधन के साथ ही रिहा होने वाले बंदी और उन्हें विदाई देने आए अन्य बंदी मौजूद थे। दीवारी से बाहर आते ही इन बंदियों की आंखों में आंसू भर आए। अम्बेड़कर जयंती पर पूरे प्रदेश में 154 बंदी रिहा हुए हैं इनमें पांच महिला बंदी भी शामिल हैं।जेल अधीक्षक सरवइया ने कहा कि क्रोध के चलते ही आप अपने परिवार, दोस्तों तथा अन्य स्नेहीजनों से दूर रहे, इसलिए यह प्रण करें कि क्रोध को अपने ऊपर हावी नहीं होने देंगे। जिससे आपका जीवन सुखमय बीते। साथ ही आपने अपने जीवन के कीमती वर्ष जेल में बिताए हैं, यह बात आपसे ज्यादा कौन जान सकता है, इसलिए अब बाहर जाकर लोगों को क्रोध से बचने के लिए आप जागरूक करें। जिससे वह इस तरह का कदम ना उठाएं।
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